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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

RUDHIVAD

उस दौर में रूढीवाद का और स्वामियों का बहोत बोलबाला था । एक दिन भगत सिंह क्या सोचता है भला :-
चारों और अँधेरा दिखे मानस हुया तंग फिरै  
अपने पै भरोसा नहीं रहया स्वामी सारे कै छाये   
कष्ट निवारण खातर जनता स्वामियों संग फिरै 
यो शरीर दुनिया मैं पदार्थ का विकसित रूप कहैं 
जो प्रत्यक्ष बोध गेल्याँ ज्ञान अर्जन का ढंग करै।।
शरीर से  बाहर आत्मा कदे रैह सकती कोण्या भाई
 शरीर मैं हो चेतना पैदा चेतना नयी उमंग भरै  ।।

दारू बनै जिन चीजों से उनमें नशे का गुण कहाँ   
 शरीर मैं चेतना पनपे फेर न्यारे न्यारे रंग  भरै  ।।    
श्राद्ध पै दिया चढ़ावा कहवैं जावै सै इन्दर लोक मैं  
अपने प्यारों को नहीं कदे श्राद्ध पंडित मलंग करै।।
पदार्थ से बनया सब पदार्थ बिन कुछ साकार नहीं 
जीवन के संघर्ष मैं मानव कुदरत संग जंग करै ।।



दिल्ली आल्यो

दिल्ली में अंग्रेजों का राज है । जनता की आवाज दिल्ली वाले सुनते नहीं हैं तो भगत सिंह क्या सोचता है भला :- 
गिनकै दिए बोल तीन सौ साठ दिल्ली आल्यो
 नहीं  सुनते बात हम देखें बाट दिल्ली आल्यो 
खत्म म्हारी पढ़ाई तम कटी गोलते कोन्या
मरते बिना दवाई तम कति सोचते कोन्या  
जुबाँ खोलते कोन्या होगे लाट दिल्ली आल्यो 
इसी निति अपनाई किसान यो बर्बाद करया
घर उजाड़ कई म्हारा अपना यो आबाद करया 
तमने फसाद करया तोल कै घाट दिल्ली आल्यो  
म्हारे बालक सरहद पै अपनी ज्यान खपावैं  
थारे घूमैं जहाजों मैं म्हारे खेत खान कमावैं 
भूख मैं टेम बितावैं थारे तो ठाठ दिल्ली आल्यो 
बांटे जात गोत पर खुल थारी पोल गयी रै
ये कच्ची चीज म्हारी बिका बिन मोल दई रै 
मचा रोल  दई रै गया बेरा पाट दिल्ली आल्यो