उस दौर में रूढीवाद का और स्वामियों का बहोत बोलबाला था । एक दिन भगत सिंह क्या सोचता है भला :-
चारों और अँधेरा दिखे मानस हुया तंग फिरै
अपने पै भरोसा नहीं रहया स्वामी सारे कै छाये
कष्ट निवारण खातर जनता स्वामियों संग फिरै
यो शरीर दुनिया मैं पदार्थ का विकसित रूप कहैं
जो प्रत्यक्ष बोध गेल्याँ ज्ञान अर्जन का ढंग करै।।
शरीर से बाहर आत्मा कदे रैह सकती कोण्या भाई
शरीर मैं हो चेतना पैदा चेतना नयी उमंग भरै ।।
दारू बनै जिन चीजों से उनमें नशे का गुण कहाँ
शरीर मैं चेतना पनपे फेर न्यारे न्यारे रंग भरै ।।
श्राद्ध पै दिया चढ़ावा कहवैं जावै सै इन्दर लोक मैं
अपने प्यारों को नहीं कदे श्राद्ध पंडित मलंग करै।।
पदार्थ से बनया सब पदार्थ बिन कुछ साकार नहीं
जीवन के संघर्ष मैं मानव कुदरत संग जंग करै ।।
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